दिल्ली मेट्रो का सामान्य संचालन और इंटरनेट सेवाएं निर्बाध रखने का निर्देश, अदालत परिसर के बाहर से धारा 163 का सूचना बोर्ड हटाने को कहा
नई दिल्ली। दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के विरोध प्रदर्शन को लेकर उच्चतम न्यायालय ने रविवार को अहम निर्देश दिए। अदालत ने कहा कि शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने वाले लोगों को गैरकानूनी रूप से हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए। साथ ही, दिल्ली मेट्रो का संचालन सामान्य रखने और इंटरनेट सेवाओं में अनावश्यक बाधा नहीं आने देने को कहा।
न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने विशेष सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। अदालत उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें कॉजपा के प्रदर्शन के दौरान मेट्रो और ट्रेन सेवाओं पर पूरी तरह रोक नहीं लगाने संबंधी पूर्व निर्देशों के कथित उल्लंघन पर अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की मांग की गई थी।
ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन को लेकर विवाद
मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ निर्वाचन आयोग के कामकाज में कथित अनियमितताओं के आरोपों को लेकर कॉजपा और कुछ छात्र संगठनों ने प्रदर्शन का आह्वान किया था। याचिका में आरोप लगाया गया कि प्रशासन ने प्रदर्शन रोकने के लिए कड़े कदम उठाए और बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया।
समाचार में दिए गए विवरण के अनुसार, शनिवार को जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन को रोकने के लिए कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई थी। इस दौरान 7,000 से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने का दावा किया गया। हिरासत में लिए गए लोगों में कॉजपा के नेता, विपक्षी दलों के कुछ नेता और यूट्यूबर ध्रुव राठी भी शामिल बताए गए।
मेट्रो और इंटरनेट सेवाएं सामान्य रखने का निर्देश
सुनवाई के दौरान पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि दिल्ली मेट्रो अपनी सामान्य समय-सारिणी के अनुसार संचालित हो और इंटरनेट सेवाएं निर्बाध बनी रहें। अदालत ने यह भी कहा कि वकीलों, पत्रकारों और अन्य लोगों को अपने पेशेवर कर्तव्यों का निर्वहन करने से नहीं रोका जाना चाहिए।
पीठ ने स्पष्ट किया कि इंटरनेट सेवाओं का निर्बाध संचालन सुनिश्चित करने का निर्देश सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत अधिकारियों को प्राप्त वैधानिक शक्तियों को समाप्त करने के लिए नहीं है।
अदालत ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा अवैध रूप से हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए। यह बात विशेष रूप से उन लोगों पर लागू होती है, जो उस क्षेत्र के बाहर शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होते हैं जहां निषेधाज्ञा लागू की गई है।
सुप्रीम कोर्ट परिसर के बाहर से सूचना बोर्ड हटाने का आदेश
उच्चतम न्यायालय ने अपने परिसर के बाहर लगाए गए उस सूचना बोर्ड को हटाने का निर्देश दिया, जिस पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 लागू होने की जानकारी दी गई थी। यह धारा संबंधित परिस्थितियों में निषेधाज्ञा जारी करने का प्रावधान करती है।
पीठ ने कहा कि यदि न्यायालय परिसर और उसके आसपास धारा 163 लागू होने की जानकारी देने वाला बोर्ड अब भी लगा है, तो संबंधित प्राधिकरण उसे हटा दे। अदालत ने कहा कि ऐसा कदम नागरिकों और वकीलों की न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।
मेट्रो स्टेशनों पर पाबंदी और हिरासत को लेकर सवाल
राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के सांसद मनोज झा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया कि पुलिस ट्रेनों से यात्रियों को हिरासत में ले रही थी। उन्होंने दावा किया कि जंतर-मंतर के चार किलोमीटर के दायरे से बाहर मौजूद लोगों को भी हिरासत में लिया गया, जबकि निषेधाज्ञा निर्धारित क्षेत्र में लागू थी।
सिब्बल ने यह भी आरोप लगाया कि उच्चतम न्यायालय के नौ अक्टूबर के आदेश के बावजूद 45 मेट्रो स्टेशनों पर यात्रियों के प्रवेश और निकास पर रोक लगाई गई थी।
वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि शहर में लगभग 45 हिरासत केंद्र बनाए गए थे और विपक्षी नेताओं सहित करीब 7,000 लोगों को हिरासत में लिया गया। उन्होंने जीटीबी नगर, विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन और अन्य स्टेशनों को बंद किए जाने का मुद्दा उठाते हुए आरोप लगाया कि अदालत के आदेश का जानबूझकर उल्लंघन किया गया।
वकीलों के साथ दुर्व्यवहार का आरोप
प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए गए वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने अदालत को बताया कि बड़ी संख्या में वकीलों के साथ कथित तौर पर बर्बर व्यवहार किया गया। उन्होंने राजधानी में स्थिति को दमनकारी बताते हुए शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के अधिकार को बहाल करने की मांग की।
फरासत ने कहा कि नागरिकों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने से रोकना गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थितियां नागरिक स्वतंत्रताओं और लोकतांत्रिक अधिकारों पर सवाल खड़े करती हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत को बताया कि वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश द्विवेदी, उत्तरा बब्बर और शादान फरासत को भी हिरासत में लिया गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण तरीके से मार्च कर रहे लोगों के साथ हिंसा की गई।
शंकरनारायणन ने मांग की कि लोगों की निर्बाध आवाजाही बहाल की जाए, सभी अवरोधक हटाए जाएं और मेट्रो स्टेशनों पर सेवाएं सामान्य की जाएं।
केंद्र सरकार ने प्रतिबंधों का किया बचाव
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में दलील दी कि 10 अक्टूबर को दिल्ली मेट्रो नेटवर्क के कुल 303 स्टेशनों में से केवल 45 स्टेशनों पर ही प्रवेश और निकास प्रतिबंधित किया गया था। उनके अनुसार, यह पूरे नेटवर्क का लगभग 15 प्रतिशत था।
मेहता ने यह भी कहा कि हिरासत में लिए गए लोगों की रिहाई की मांग करने वाली याचिकाएं अब विचारणीय नहीं रह गई हैं, क्योंकि हिरासत में लिए गए अधिकांश लोगों को पहले ही रिहा किया जा चुका है।
मामले में प्रदर्शनकारियों की ओर से हिरासत, मेट्रो सेवाओं पर प्रतिबंध और कथित दुर्व्यवहार को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए, जबकि केंद्र सरकार ने सुरक्षा व्यवस्था के तहत लगाए गए प्रतिबंधों का पक्ष रखा। उच्चतम न्यायालय के निर्देशों का मुख्य उद्देश्य शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार, सामान्य सार्वजनिक सेवाओं और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन सुनिश्चित करना है।
